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ईष्ट देवता और आराध्य देवता में क्या अंतर है ?

कौन हैं आपके ईष्ट देवता ?कितने तरह के ईष्ट देवता होते हैं ?

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कैसे करे ईष्ट देवी-देवता का चुनाव [व्यक्तिगत पूजा के सन्दर्भ में ]

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       आस्तिक लोगों द्वारा विभिन्न ईश्वर रूपों की उपासना ,आराधना ,प्रार्थना ,पूजा ,साधना की जाती है और जिन देवी देवताओं की पूजा -आराधना की जाती है वह उनके आराध्य होते हैं |लोग आराध्य देवता और ईष्ट देवता को एक ही मानते हैं किन्तु सभी के लिए यह सत्य नहीं होता |आराध्य देवता ही ईष्ट देवता हो सकता है तथा ईष्ट देवता ही किसी का आराध्य भी हो सकता है किन्तु सबके साथ ऐसा नहीं होता |आराध्य देवता इच्छानुसार या आवश्यकतानुसार या परंपरागत पूजा में बना लिए जाते हैं |यह कई हो सकते हैं किन्तु सबका ईष्ट देवता केवल कोई एक ही होता है |ईष्ट देवता वह होता है जो व्यक्ति विशेष के लिए अलग से सबसे अधिक उपयुक्त ,फलप्रद ,मुक्ति कारक ,सदैव और समग्र सहायक होता है |यह व्यक्ति के लिए नैसर्गिक उन्नति कारक देवता होता है |ईष्ट देवता का निर्धारण केवल जन्म कुंडली से या गुरु द्वारा किया जा सकता है ,इन्हें अपनी इच्छानुसार नहीं बना सकते जबकि आराध्य देवता इच्छानुसार भी बना सकते हैं ,आवश्यकतानुसार भी बना सकते हैं और कुंडली द्वारा या गुरु द्वारा भी निर्धारित किये जा सकते हैं |

          प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक ,मानसिक संरचना ,उर्जा परिपथ और उसकी कार्य प्रणाली भिन्न होती है ,सभी में एक दूसरे के सापेक्ष सूक्ष्म अंतर अवश्य होता है ,ऐसे में किसी एक के ईष्ट ही दूसरे के भी ईष्ट कैसे हो सकते है ?,,आराध्य या इष्ट का चुनाव व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं करना चाहिए या गुरु का मार्गदर्शन लेना चाहिए, |,सामान्यतया किसी ईष्ट या आराध्य देवता के प्रति नैसर्गिक झुकाव भी कुछ हद तक संकेत देते हैं जो पूर्वकृत कर्मो और जन्मों से जुड़े हो सकते है |,इन झुकाओं का मतलब है इनकी कृपा आप पर नैसर्गिक रूप से है और ये आप पर प्रसन्न हैं और आपको अपनी और आकर्षित कर रहे हैं |यह आपके ईष्ट हो सकत हैं |,,अब आपको अपनी भौतिक आवश्यकताओं और सुचारू जीवन हेतु ,सामान्य कष्टों से मुक्ति हेतु ईष्ट का चुनाव करना है जो आज की उर्जा जरूरतों को भी संतुलित कर सके और मुक्ति में भी सहायक हो |यह यदि ईष्ट से अलग होते हैं तो आराध्य देवता माने जायेंगे जिनकी उपासना आवश्यकता पूर्ण होने के बाद बंद की जा सकती है तथा किसी दूसरी आवश्यकता के लिए किसी दुसरे आराध्य की उपासना की जा सकती है |ईष्ट के मामले में ऐसा नहीं हो सकता ईष्ट बार बार नहीं बदला जा सकता |

              ईष्ट या आराध्य का चुनाव ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति से ,,गुरु के निर्देश द्वारा या तंत्र के माध्यम से स्वयं किया जा सकता है |आराध्य का चुनाव भी आवश्यकता और देवता की प्रकृति के अनुसार स्वयं किया जा सकता है | .

[१] .सामान्यतया कुंडली से ईष्ट का चुनाव करते समय लग्न -पंचम आदि भाव ,इनपर दृष्टि डालने वाले ग्रहों का तुलनात्मक अध्ययन कर ईष्ट का चुनाव किया जाता है ,.जब ग्रहों के अनुसार ईष्ट का चुनाव करे तो दुर्बल ग्रहों के देवता की पूजा करनी चाहिए [किन्तु वह कुंडली में शुभ हो ],,स्वामी ग्रह यदि दुर्बल है तो उसकी ही शक्ति चाहिए आपको ,,जो बढा हुआ है उसकी वस्तुओ का दान देना और दान न लेना उपयुक्त होता है |.एक तमाशा सामान्य देखा जाता है ,सामान्य मान्यता है की शनि ग्रह का शुभ फल तब प्राप्त होता है जब लोहा दान दिया जाए ,दूसरी मान्यता है की लोहे की अंगूठी पहनी जाए ,,दोनों एक साथ करवाते बहुत से ज्योतिषी विद्वान मिल जायेगे ,,सोचिये एक तरफ दान दे रहे है दूसरी तरफ पहन रहे है ,क्या अर्थ है इसका ,,वास्तव में शनि दुर्बल किन्तु आपके लिए घातक नहीं है तो लोहे की अंगूठी शुभ फल देगी ,ऐसे में दान नहीं करना चाहिए ,,यदि पहले से शनि घातक है और शक्ति बढा है तो लोहे की अंगूठी तो आपके लिए जानलेवा तक हो सकती है ,,ऐसे में व्यक्ति को तो लोहा दान देना चाहिए ,,अतः सदैव देखना चाहिए की जिस ग्रह को शक्ति की आवश्यकता है तो उसकी या उसके देवी -देवता की पूजा करे ,,आश्चर्य है की इतनी मूल बात लोग ध्यान नहीं देते और पूजा कर ऐसे शक्ति की भी ताकत बढाते है तो खुद उनके लिए घातक होता है ,इसीलिए तो ढेरो पूजा -आराधना के बाद भी कलह-झगड़े-पतन -अवरोध से मुक्ति नहीं मिलती ,जबकि सही ईष्ट जानकार दूसरा थोड़े से मानसिक पूजा से भी सफल हो जाता है ..

[२] .ईष्ट के चुनाव का दूसरा उपाय है ,योग्य गुरु से गुरु दीक्षा लेना और देवी -देवता या मंत्र का चुनाव उनके निर्देश के अनुसार करना …

[३] .ईष्ट के चुनाव का तीसरा और सर्वोत्कृष्ट उपाय है तंत्र का माध्यम ,,इसमें आप अँधेरे में बैठ जाए ,नाक की नोक पर भाव दृष्टि एकाग्र करते हुए अंगूठे को भृकुटी के मध्य आज्ञाचक्र पर तीन मिनट तक आँखे बंद करके रखे ,,दिमाग -मन बिलकुल शांत रखे ,तीन मिनट बाद वहा मानस पटल पर अंदर अँधेरा है ,कोई प्रकाश नहीं है ,कोई बिंदु प्रकाश नहीं है ,तो शिव जी या उनके चन्द्रमा की पूजा करे ,,अँधेरे का मतलब आपमें काली और भैरव के गुण बढे है और आपको शिव या उनके चन्द्रमा की आवश्यकता है ,यदि अन्य रंग का प्रकाश है ,तो उस प्रकाश के विपरीत देवी-देवता का चुनाव करे ,,यह प्रकाश या रंग यह व्यक्त करता है की सम्बंधित रंग या प्रकाश के ग्रह या देवी-देवता का गुण आपमें पहले से बढ़ा  है ,इसके विपरीत की आपको आवश्यकता है,जिससे संतुलन बन सके और आप सुखी हो सकें  ……………………………………………………………………………हर-हर महादेव


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