अधिकतर लोग तंत्र शब्द सुनते ही डर जाते हैं, लेकिन सच यह है कि— “तंत्र कोई जादू नहीं, बल्कि चेतना का विज्ञान है।”
तंत्र का अर्थ है— वह विधि, जिससे मानव अपनी छुपी हुई शक्तियों को पहचान सके।
तंत्र में—मंत्र (ध्वनि की शक्ति),यंत्र (ज्यामिति की शक्ति) और साधना (चेतना की शक्ति) तीनों का संतुलन होता है।
तंत्र का उद्देश्य है—किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं बल्कि आत्म-उत्थान और ऊर्जा जागरण
हर इंसान के भीतर एक अदृश्य ऊर्जा होती है, जिसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है—प्राण शक्ति, कुण्डलिनी ऊर्जा ,चेतना शक्ति ,जब यह ऊर्जा सुप्त अवस्था में होती है, तो व्यक्ति सामान्य जीवन जीता है। लेकिन जब यही ऊर्जा जागृत होती है—
विचार शक्तिशाली हो जाते हैं, आकर्षण बढ़ता है और आत्मविश्वास अपने आप जन्म लेता है
यही है आध्यात्मिक ऊर्जा।
शास्त्रों में कहा गया है—
मनुष्य की रीढ़ के मूल में एक सर्पाकार शक्ति सोई रहती है—कुंडलिनी। जब यह शक्ति— मूलाधार से उठकर सहस्रार तक पहुँचती है तो व्यक्ति को— दिव्य अनुभव, गहरी शांति और आत्म-बोध प्राप्त होता है लेकिन बिना गुरु और सही विधि के कुंडलिनी जागरण हानिकारक भी हो सकता है। इसलिए तंत्र में संयम, शुद्धता और धैर्य सबसे ज़रूरी हैं।
तंत्र न अच्छा है, न बुरा — उपयोगकर्ता पर निर्भर है। जैसे— चाकू से फल भी काटा जा सकता है और किसी को चोट भी पहुँचाई जा सकती है उसी तरह— सच्चा तंत्र साधक— करुणा ,आत्म-नियंत्रण और सेवा के मार्ग पर चलता है ,जो तंत्र का गलत प्रयोग करता है, वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है।
कुछ सरल नियम— ब्रह्ममुहूर्त में जागना, नियमित ध्यान, सात्विक भोजन और मौन का अभ्यास, इनसे— नाड़ी शुद्ध होती हैं, मन स्थिर होता है और ऊर्जा स्वतः बढ़ने लगती है ,याद रखिए— “शक्ति बाहर नहीं, भीतर है।” अब वह गुप्त सत्य, जो बहुत कम लोग बताते हैं— तंत्र शक्ति तब तक काम नहीं करती, जब तक आपका मन शुद्ध नहीं होता। जो व्यक्ति— अहंकार से भरा है या दूसरों को नुकसान पहुँचाना चाहता है उससे शक्ति दूर भागती है। लेकिन जो व्यक्ति— भक्ति, श्रद्धा और धैर्य से चलता है उसे शक्ति खुद ढूँढ लेती है।……………………………………..हर हर महादेव


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